Saturday, October 2, 2021
Thursday, September 2, 2021
Wednesday, September 1, 2021
सुबह की सैर
कल अंधेरे मे घुमने निकला तो सुबह की ठंडी हवा से मन मे एक अजीब सी पुलक थी मैं सोच रहा था इतनी प्रसन्नता तो पहले कभी नही होती थी . सोचता चला जा रहा था फिर मन तो उछलने लगा , लगा कोई पुरानी घटना याद आगयी होगी चलता जा रहा था. चलते 2 देखा सामने एक व्यक्ति भिखारी सा , कपडे फटे थे हँस रहा था , अपने मे मगन पता नहीं आसमान की ओर देख कर कुछ बोल रहा था.मै भी तमाशबीन जैसा खडे हो कर सुनने लगा . मै तो अकेला ही था . कह रहा था तू मुझे क्या समझता है कि मै जानता नहीं तुने सबका ठेका ले रखा है , सबका ख्याल रखेगा . क्यों रे मै तेरा दुश्मन हूँ दूसरों को तो जो वो मांगते हैं , देता है. मैं कहता हूँ तो सुनता नही. कब से मै तेरे से मिलना चाहता हू क्या तेरे को सुनाई नहीं देता . अब तो वह बाकायदा जोर 2 से चिल्लाने लगा था हवा में हाथ हिला 2 कर पता नहीं किसको संबोधित कर रहा था ,. मै करीब आधा घंटा खडा रहा उसका गुस्सा देखता रहा . पता नहीं क्या हुआ एक दम चुप होगया फिर हाथ उठाये दोनो और रुआंसा होगया कह रहा था अब आजा मिल जा अब रहा नही जाता . मुझे कुछ समझ मे नही आरहा था , सोचा इस पागल के चक्कर मे क्यों समय बर्बाद करना , घर वापस आगया . दूसरे दिन फिर सुबह घुमने निकला आज भी हवा तो चल रही थी वह पुलक वह उत्साह नहीं था मन मे . हवा तो ठंडी चल रही थी पर थकान ,ग्लानि सी मह्सूस हो रही थी .
मन मे अजीब सा खालीपन सा था एक क्रोध मिश्रित निराशा सी भर गयी थी जब देखा वह स्थान तो खाली था जहाँ वह पागल भिखारी बैठा था . अपनी कथरी भी छोड़ गया था .
पता नहीं क्यों मेरे मन मे एक विचार आया उस भिखारी को ढुंढू , एक क्षण तो ऐसा लगा मैं भी दोनो हाथ उठा कर वह जहाँ भी है उससे मिलने दौड़ लगा दू,
तभी मोबाइल कि घंटी ने ध्यान खींच लिया .घर आकर जब थोड़ा शांत मन होकर अकेला आँखें बंद कर छत पर अकेला बैठा था तो मैंने देखा कि अब मेरे भी दोनो हाथ आसमान की तरफ उठे हुये थे मै भी शून्य में कह रहा था उस फक़ीर की सुन लेना .
कहते हैं तु सबकी सुनता है .
और पता नहीं कब मेरी आँखें भर आयीं . पत्नी कह रही थी उठो क्या हो गया रो क्यों रहे हो ?
और र्मैने आँखें पोंछते हुए कहा , नहीं, कुछ नहीं , शायद कोइ कचरा आंख में चला गया था . और एक लम्बी सांस भरते हुए नीचे आगया .
. में वापस घर की तरफ रुख कर लिया . फिर दिन भर उसका खयाल आता रहा उसकी बात याद आती रही
तु सबकी बात सुनता है . अब मेरे भी दोनो हाथ आसमान की तरफ उठे हुये थे मै भी शून्य में कहरहा था उस फक़ीर की सुन लेना .
कहते हैं तु सबकी सुनता है .
Monday, August 30, 2021
जन्माष्टमी
कृष्णजन्म दिवस
आज जन्माष्टमी है आज के ही दिन मानवता का उद्धारक ,धर्म संस्थापक , गीता के उपदेशक और पूर्णावतार श्रीकृष्ण चन्द्र का जन्म काली अन्धकार से परिपूर्ण और भीषण वर्षा में पानी से सराबोर पृथ्वी पर अवतरण हुआ ५००० वर्ष पूर्व पीड़ित मानवता को तो शायद अंदाज़ भी नहीं था कि किस युगपुरूष का पदार्पण हुआ है किसके पादस्पर्श से धरती पुण्य सलिला हो गयी है धन्य होगई है . वसुदेव को पता था पर वह भी उसे साधारण नवशिशु समझ रहे जो आकाशवाणी के अनुसार कंस के अत्याचार से मुक्ति दिलाएगा और आठंवाँ पुत्र होने के कारण कंस कारागार से मुक्ति दिलाएगा .देवकी को क्या मालुम था कि वह उसे अपने पुत्र को एक बार भी स्तनपान न करवा पायेगी . एक बार भी अपने नवजात शिशु का दर्शन नहीं कर पायेगी . बाबा नन्द को कहाँ पता था की ईश्वर ने उनको मानवता के पूर्ण कल्याणकर्ता के पालन पोषण का भार दिया है बाबा नन्द समझ रहे थे कि उस शिशु की सुरक्षा का भार उन पर है .कितने भ्रम में उस मायापति ने सब को रखा था . इसीलिये तो गोपियाँ उसको छलिया कहती थीं तो गलत थोड़े कहतीं थी . उन्होंने तो सरल बुद्धि से पहचान लिया था . जासोदा मैय्या भी कहाँ पहचान पायी थे नईं तो क्या डंडे से डराती ,? उसको / जो मानवता का भय दूर करने आया था . उसको किससे भय ?
कोइ भी तो नहीं समझ पाया था उसको . शैशव से लेकर आखिर तक मृत्यु पर्यंत . ज़रा भी तो यही समझा था ना कि हिरन के मुख पर निसाना साध रहा हूँ . बलदाऊ तो आखिर तक भी नहीं समझ पाए थे . इसीलिए आखिर वक़्त में भी यादवों को बचाने में लगे थे उन्हें भी कहाँ पता था की बचाने वाला तो मुख मोड़ चुका है अब तो सिर्फ कटे हुए सर और धड़ शराब पीकर एक दूसरे को मार रहे हैं . कैसे समझते ? अहंकारी जो थे .
इस कृष्ण ने अपने मित्रों को सबसे जादा धोखा दिया . अर्जुन भी उसे सखा कह कर यादव २ कहता रहा . हास परिहास करता रहा . गीता ज्ञान के बाद भी कहाँ समझ पाया था . अगर समझ पाता तो क्यों शकुनी पर क्रोध करता क्यों उस धृष्टदयुमन पर क्रोध करता . उसने किसी को नहीं छोड़ा जिसको लगा की ये मेरा है उस पर अधिकार जताने लगा उसे बिलकुल नहीं छोड़ा . देखा नहीं गोपियों का क्या हाल कर दिया था . अभी भी यही करता है पर लोग हैं कि मानते नहीं . बाज नहीं आते . पता नहीं क्या आकर्षण है .
कहते हैं कि जिसके मुख पर पानी है उसकी ओर स्वाभाविक आकर्षण होता है . मन आकर्षित हो ही जाता है . तो इस सांवले रंग वाले में क्या आकर्षण है कि निगाहें मन टिक ही जाती है .इसका कोइ सम्बन्ध जल से है तो जरूर . पैदा हुआ तो वर्षा ऋतू में भादव के महीने में अंधेरी रात में और बारिश की झड़ी में . बिजली की कडकडाहट में जैसे वसुदेव को रास्ता दिखा रहा हो . और कालिंदी तो जैसे प्रतीक्षा कर रही थी उसका जल भी काला और शिशु का वर्ण भी काला . पाँव छूने को आतुर क्या उसे डर था या प्रार्थना कर रही थी की कहीं भाई यम को बहुत कार्य न करना पड़े . पर वह कहाँ माना महा भारत में तो अंक कम पड़ गए गिनती छोटी पड़ गयी और रही सही कसर मृत्यु पूर्व यादवों के संहार में पूरी कर दी .वो तो रिश्तेदार थे कुटुम्बी थे . ? थे कि नहीं .
पर ये तो लगता है कि इसका जल तत्व से कोइ तो सम्बन्ध है जरूर .
Saturday, August 28, 2021
Meeting The Dervish
meeting the dervish
Today, when I peeped inside, I saw a dervish sitting in the inner room of my house. As I looked at him . I thought I had seen him somewhere , I tried hard , but could not remember anything.
But what is he doing here ?
And then how did he come in here , the door was locked from outside .
And I too have come inside with the lock open.
But he was staring beyond me, oblivious to my presence, as if he could see something on the other side of my body.
And he was addressing to him , he was saying , why ! why do you give such addresses ,. now this man asking who are you . What I can tell? Now tell me Who am I . you are very mischievous. now this person does not know neither me nor himself.
why did you send me here. tell me! tell me. I know you will never reveal your identity nor mine.
These people don't know themselves and neither they want to know . what can I do ?
How many locks have to be opened ? How many locks these people keep , inside and out side ? then he again addressed me , it is So dark , in the room. At least , light a lamp and keep it inside you . There will be some light. Neither itself looks great , nor to anyone else.
I was muttering to myself in anger. He was again asking some invisible What can I do ?
In such darkness, even my eyesight has started getting weak.
If he does not want to , somebody else has to lit a candle .
who else but me ?
and then there is such a strong storm in this room. that it is difficult to handle.
Now I could understand a little how he came in ?
Now he stood up and started saying that he was sent by Him
I said , who sent you, Baba , now he was again very angry. and said with a swaying hand, now this also has to be told , I don't know how it is . people.
Now again I asked him, tell me who sent you baba.
And then thinking something, eyes closed, he started speaking to himself. he was blabbering some word to himself , what I can tell you. I myself do not know his name , never asked His name.
Now I started enjoying talking to him.
I laughed and said, where will you go ?
Who will believe it baba ?
does he know you ?
Absolutely He knows me, baba said .
But he said crying in despair.
what can I say .
Where do you live baba ? .
Don't know.
He says , I live everywhere.
I live in every soul.
Then he stared at me at once , continuously , without blinking an eye . He is in you too. He was saying that I live in everything.
You don't know , you have it too.
I got a shock.
But then I told him, see Baba , if you want something, tell me , I do not have much time , I have to go out.
And how long will it be outside ? . So far you have lived outside enjoying the outer world . Now enjoy your inner self, my dear.
why do you Want to go out now ? I thought ! though , what about this question? I shrugged.
But I was forced to think .
baba was asking again , Yes what did you get from living outside.
I was suddenly shocked again but this time with a surge of joy and happiness. They call it Aananda.
And then there was suddenly a melody filled the whole atmosphere.
Chala wahi desh. meaning come with me to the land of inner peace, joy and happiness.
And I started looking at his face in bewilderment. But he was not. I asked myself is it hallucination ?
And started laughing. laughing and laughing uncontrollably
But that monk still haunts me and reminds come with me to that unexplored land of infinity.