Thursday, September 2, 2021

Meeting The Dervish

Wednesday, September 1, 2021

सुबह की सैर

 कल अंधेरे मे घुमने निकला तो सुबह की ठंडी हवा से मन मे एक अजीब सी पुलक थी मैं सोच रहा था इतनी प्रसन्नता तो पहले कभी नही होती थी . सोचता चला जा रहा था फिर मन तो उछलने लगा , लगा कोई पुरानी घटना याद आगयी होगी चलता जा रहा था. चलते 2 देखा सामने एक व्यक्ति भिखारी सा , कपडे फटे थे हँस रहा था , अपने मे मगन पता नहीं आसमान की ओर देख कर कुछ बोल रहा था.मै भी तमाशबीन जैसा खडे हो कर सुनने लगा . मै तो अकेला ही था . कह रहा था तू मुझे क्या समझता है कि मै जानता नहीं तुने सबका ठेका ले रखा है , सबका ख्याल रखेगा . क्यों रे मै तेरा दुश्मन हूँ दूसरों को तो जो वो मांगते हैं , देता है. मैं कहता हूँ तो सुनता नही. कब से मै तेरे से मिलना चाहता हू क्या तेरे को सुनाई नहीं देता . अब तो वह बाकायदा जोर 2 से चिल्लाने लगा था हवा में हाथ हिला 2 कर पता नहीं किसको संबोधित कर रहा था ,. मै करीब आधा घंटा खडा रहा उसका गुस्सा देखता रहा . पता नहीं क्या हुआ एक दम चुप होगया फिर हाथ उठाये दोनो और रुआंसा होगया कह रहा था अब आजा मिल जा अब रहा नही जाता . मुझे कुछ समझ मे नही आरहा था , सोचा इस पागल के चक्कर मे क्यों समय बर्बाद करना , घर वापस आगया . दूसरे दिन फिर सुबह घुमने निकला आज भी हवा तो चल रही थी वह पुलक वह उत्साह नहीं था मन मे . हवा तो ठंडी चल रही थी पर थकान ,ग्लानि सी मह्सूस हो रही थी .

मन मे अजीब सा खालीपन सा था एक क्रोध मिश्रित निराशा सी भर गयी थी जब देखा वह स्थान तो खाली था जहाँ वह पागल भिखारी बैठा था . अपनी कथरी भी छोड़ गया था .

पता नहीं क्यों मेरे मन मे एक विचार आया उस भिखारी को ढुंढू , एक क्षण तो ऐसा लगा मैं भी दोनो हाथ उठा कर वह जहाँ भी है उससे मिलने दौड़ लगा दू,

तभी मोबाइल कि घंटी ने ध्यान खींच लिया .घर आकर जब थोड़ा शांत मन होकर अकेला आँखें बंद  कर छत  पर अकेला बैठा था तो मैंने देखा   कि   अब मेरे भी दोनो हाथ आसमान की तरफ उठे हुये थे मै भी शून्य में कह रहा था उस फक़ीर की सुन लेना .

कहते हैं तु सबकी सुनता है .

  और पता नहीं कब मेरी आँखें भर आयीं . पत्नी कह रही थी उठो क्या हो गया रो क्यों रहे हो ?

  और र्मैने आँखें  पोंछते हुए कहा , नहीं, कुछ नहीं ,  शायद  कोइ कचरा आंख  में  चला गया था . और एक लम्बी सांस भरते हुए नीचे आगया . 

 

. में वापस घर की तरफ रुख कर लिया . फिर दिन भर उसका खयाल आता रहा उसकी बात याद आती रही

तु सबकी बात सुनता है . अब मेरे भी दोनो हाथ आसमान की तरफ उठे हुये थे मै भी शून्य में कहरहा था उस फक़ीर की सुन लेना .

कहते हैं तु सबकी सुनता है .