Sunday, April 10, 2022

Aunkareshwar ka ghaat और दरी क्या थी खाद की बोरियों से बनी एक चौड़ी पल्ली थी .पर यह खाद की बोरी की पल्ली पर बहुत काम की थी. परिक्रमा में बहुत हलकी और waterproof थी . बरसात में खोल कर उसे सर से पाव् तक रेनकोट बनाकर बारिश में भी चलते रहते थे . पर उस भोले भाले ग्रामीण का भाव वास्तव में स्तुत्य था . और उसने दिया दिया भी अच्छे भाव से था . शायद ओम्कारेश्वर के आसपास या शायद ॐकारेश्वर में ही नर्मदा घाट पर ही थकान और भूख के कारण लेट गया था और झपकी लग गयी थी. उकडू हो कर सोया हुआ था . भूखे पेट में ठण्ड लगती भी ज्यादा है शाम का वक्त होगया था घाट से धुप तो चली गयी थी पर पत्थर अब तक हलके गर्म थे . वहीं पर लेट गया था . मक्खियाँ घाट पर भिन भीना रही थी . मेरी नींद खुली तो देखा एक ग्रामीण कुर्ता पयजामा पहना बिलकुल बगल में बैठा हाथ मेरे मुंह पर हिला रहा था . मैं एक दम उठ बैठा वह थोड़ा अचकचा गया और संभल कर बैठ गया और सफाई देने लगा , महाराज आप गहरी नींद में सोये हुए थे मैं गुजर रहा था आपके मुंह पर मक्खियाँ भिनभिना रही थी तो मैं उन्हें उड़ाने लगा . आप के पास कोइ दरी नहीं है क्या ? मैं चुप रहा . वह समझ गया कि नहीं है . उसने अपने पुराने से थैली में से यह दरी नाम की वस्तु निकाला और देदिया और पाँव छुए . यह एक तरह से परम्परा है कि कुछ भी अर्पण कर के जिसे अर्पित किया है उसके चरण छूना . यह संकेत है की महाराज आप स्वीकार करें और जब उसे आशीर्वाद मिल जाता है तब वह संकेत है कि एक तो आपने स्वीकार कर लिया और दूसरे अर्पित करने वाले का अहंकार भी देने के अहंकार से मुक्त होजाता है . मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया और उसे नर्मदे हर कह के आशीर्वाद भी दिया . कहने लगा गरीब हूँ महाराज और कुछ नहीं देसकता . मैंने कहा कैसे आये नर्मदा स्नान करने ? बोला, नहीं महाराज सुबह की आरती कर के औंकारेश्वर की छोटी परक्रमा कर के दस ग्यारह बजे तक कल सुबह अभिषेक कर के निकलना है . सोओगे कहाँ . यहीं घाट पर . यहाँ सुबह भी संतों के दरशन भी होजाएंगे सुबह सौन्दारे साध महात्मा स्नान करने आते हैं . उनको स्नान करते देखना भी पुण्य का काम है . और जल्दी परक्रमा कर के अभिषेक कर के घर जाकर खेत में जाना है . मैं आश्चर्य से उसका मुंह देखने लगा . शायद यह मुझ जैसे लोगों के लिए सन्देश भी था की भारत में पूजा अर्चना साप्ताहिक कार्य नहीं है यह दैनन्दिनी का हिस्सा है . अलग से छुट्टी लेने की या सारे संसार को छुट्टी देने की जरुरत नहीं. मैंने उसके झोले को देखा तो खाली हो गया था . मैंने उससे पूछा भी कि भूख लग रही है क्या ? चुप रहता मुझे तो भूख लग रही है चलो भोजन करते हैं . बोला अब तो अन्धेरा हो गया है . अब न मिलेगा . मैंने कहा चलो चक्कर लगा कर आते हैं . मुझे मालूम था इतने आश्रम हैं कहीं न कहीं मिल जाएगा . थोड़ी दूर पर एक पुराणी सी बिल्डिंग में रोशनी थी . लोग आजा भी रहे थे . हम लोग निकलने लगे तो एक सज्जन कहने लगे महाराज भोजन परसादी पा लो . मैं भी अन्दर घुस गया . भर पेट खाया . पूरे दो दिन बाद भोजन मिला था . दो दिन से आटा घोल कर पीना पड़ रहा था . मैं घाट पर आकर सोगया वह दरी बिछा कर सोगया . सुबह ४ बजे नींद खुली तो मेरी आँखें फटी २ रह गयी . वह व्यक्ति बगल में ही नंगे फर्श पर सो रहा था . और हलचल से वह भी उठ गया था . मुझसे पूछ रहा था महाराज नींद तो अच्छी आयी . अब मेरी बारी थी उसके पैर छूने की . मेरी ईच्छा हुई की अपने पास की सब पुस्तकें नर्मदा में ही खमा दूं . मैं विचित्र मनःस्थिति में था . लग रहा था . मैंने जीवन भर क्या किया . ? केवल पुस्तकें पढी पर समझा तो कुछ भी नहीं . मैं ने नर्मदा दर्शन किये , नित्य क्रिया और पूजा पाठ से निवृत्त होकर वापस वहीं आया पर काग भुशुण्डी तो घाट पर नहीं थे . चले गए थे . निमाड़ी में कहावत है भणया पर गुणया नी . यह भोला भाला ग्रामीण जीवन का सबसे अमूल्य पाठ पढ़ा कर चला भी गया .